सावन और बाबुल
नव किसलय ने झाड़ दी फिर,
बूँदों की झालर,
पात पात ने चमकाए फिर,
धोकर अपने आँचर,
घनद की घनघोर घटा से,
चमकती नाचती चपला बिजली,
वीर बहूटी सुना रही फिर,
आज सुरीली कजरी,
मटमैले पानी के डबरे में,
कागज की नाव में बैठा बचपन,
धुंधलाते चेहरो में,
छूट गई सखियों को, ढूंढता मन|
नन्हीं हथेलियों पे बने,
वो मेंहदी के बेलबूटे,
वो अल्हड़ कुलाँचे, श्रावणी सपने,
न जाने कहाँ छूटे|
अपने घरौंदे से निकल,
पहुँच जाता बाबुल के आँगन,
आँखों का खारापन धुल जाता,
बूँदों के झूले पे आता जब सावन|