पतंगो का मौसम
लो फिर पतंगो का मौसम है आया,
छतें हुई गुलजा़र,
आसमां पे रंगीं मेला है उमड़ आया।
डरते डरते उड़ते हैं परिंदे,
परों के कटने का डर कैसा छाया,
सड़क पर भाग कर लूटते हैं पतंगे,
बच्चें, जिनके सिरों पर न है छतों का साया।
दोपहर का सन्नाटा भी बैठ गया दरख्तों पे,
काटा काटा का शोर भी क्यूँ मन को भाया।
मुलायम सी धूप में खिल ऊठा मौसम भी,
कुहाँसे की रजा़ई में दुबका था जो अलसाया।
जुड़ी जुड़ी मुंडेरों पर होती हैं जब आँख चार,
सपनों को ऊँचा करते ,ये कौन हौले से गुनगुनाया।
संगीता
लो फिर पतंगो का मौसम है आया,
छतें हुई गुलजा़र,
आसमां पे रंगीं मेला है उमड़ आया।
डरते डरते उड़ते हैं परिंदे,
परों के कटने का डर कैसा छाया,
सड़क पर भाग कर लूटते हैं पतंगे,
बच्चें, जिनके सिरों पर न है छतों का साया।
दोपहर का सन्नाटा भी बैठ गया दरख्तों पे,
काटा काटा का शोर भी क्यूँ मन को भाया।
मुलायम सी धूप में खिल ऊठा मौसम भी,
कुहाँसे की रजा़ई में दुबका था जो अलसाया।
जुड़ी जुड़ी मुंडेरों पर होती हैं जब आँख चार,
सपनों को ऊँचा करते ,ये कौन हौले से गुनगुनाया।
संगीता