संबोधन में मेरी अनुभूतियाँ ही नहीं अपितु आपकी भी अभिव्यिक्त है| शब्द अवश्य मेरे हैं पर भावनाऍ आपकी भी सम्मिलित हैं | मेरा संबोधन है समाज से, अपने आप से, प्रकृति से और संबंधो से, साथ ही उस परम सत्ता से जो मुझे अभिव्यक्ति की सामर्थ प्रदान करती है| थोड़ा सा भी मेरा लेखन आपके दिल को कहीं छूता है तो मेरी सार्थकता फलीभूत हो सकेगी |
क्या अच्छा लगा या क्या कमी खली दोनों ही प्रतिक्रियाओं का तहेदिल से स्वागत है |