Thursday, 12 April 2012

आमंत्रण

 
ओ  सागर,
बारबार  तुम्हारे  आमंत्रण  पर
उत्तर  से  दक्षिण  चली  आती  हूँ  मैं
सोचकर  कि  तुम्हारे  इस  हरित  जल  में
विलीन  कर  दूँ  अपना अस्तित्व

हर पल तुम्हारी लहरों में,
बहता उत्ताल  संगीत
मुखरित करता मुझे कि
शब्द सौंपकर गीत बना दूँ इस संगीत से

तट पर होती तु्म्हारी यह व्यग्रता
प्रश्न पूछती मुझसे कि ह्रदय
में भी क्या तुम एसे ही हो ?

क्षितिज को छूती
तुम्हारी यह विस्तृत जलराशि
तुम्हारी गहनता का प्रतिबिम्ब
उकेर देती है मेरे मानस में

बालरवि के आने से पहले
तुम्हारे तट की रेत पर,
पदचिन्ह बनाते हुए चलना
और तुम्हारा आकर मेरे
पैरों का सहलाना बारबार
कि जैसे सहलाता है पिता
पितृगृह आई अपनी बेटी के माथे को

आज घर लौटते हुए
कि पीहर से मानो ले रही हूँ विदा
मेरी आँखे समा लेना चाहती हैं
तुम्हारे हर मंज़र को
तुम्हारे सारे संवादों को

सोचती हूँ
कि अब जाने कब
फिर तुम मुझे आवाज़ दोगे
और मैं चली आऊँगी तुम्हारे पास
एक नया गीत गुनगुनाने |

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