Saturday, 3 November 2012

सावन

सावन तुम जब भी मेरी खिड़की पर दस्तक देते हो,
अलसाए से मन को उर्जा से भर देते हो |
बूंदों की छड़ी से जादू सा चला देते हो,
कुदरत की हर कोंपल को रंगो से भर देते हो
 
बादलों का झोला लटकाए
कभी हौले कभी तेज बरसते हो |
धरती के दामन को सौगातों से भर देते हो |
 
मिट्टी की खुशबू ये पैरों की छपछप,
अलबेली सी बयार संग नाचते ये विटप
पेड़ों के झूले ये हाथों की मेंहदी
लहेरियों के आँचल में, तीजों की मस्ती
भीगे से तन और भीगे से मन में,
विरहा की टीसें हौले से सिसकती |
 
 बाबुल के आँगन में सखियों के गानें
सिगड़ी पर सिकते वो भुट्टों के दानें
सावन तुमने छेड़ दिया क्यूँ यादों का साज़
बावरे से मन को कौन संभाले आज |
 
सावन तुम जब भी मेरी खिड़की पर दस्तक देते हो
इंद्रधनुषी  पंखों पर बैठा कहीं दूर ले चलते हो
सावन तुम जब भी मेरी खिड़की पर दस्तक देते हो |

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