Wednesday, 9 January 2013

दिल्ली १६ दिसम्बर


शब्द थर्राते हैं, और कलम है काँपती,

क्या लिखे नारी की नियती यह समझ नहीं पाती,

तुम कितना ही दुर्लभ मानो इस मनु्ष्य जन्म को,

पर जब इसी में हो आत्मा भेड़िये की ,

तो ईश्वर भी मल रहा होगा हाथ,

कि क्यूं भेजा इन दरिंदो को पृथ्वी पर,

लगा दिया जिन्होनें मानवता पर एसा दाग.

नृशंसता की पराकाष्ठा ओर वीभत्सता का ताँडव,

कलयुग का चरम समय,

संवेदनाओं का वन यह खांडव.

मिटा दिया करुणा का अस्तित्व धरा से,

जीवित हो फिर भी कैसी बेहया से,

थूक रही सभ्यता तुम पर,

और धिक्कार रही उस माँ की कोख,

जिसने तुम को यह चोला पहनाया,

दुष्कर्म एसा करने से पहले ,

क्या माँ का चेहरा भी याद नहीं आया|

 

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