Wednesday, 9 January 2013

yado me dhoop


यादों में धूप

यह कोमल सी धूप उतरती जब आँगन में,

यादों के पत्ते झरते चुप बैठे एकाकी मन में,

बचपन की गलियों से आती,

जब जब अल्हड़ आवाजें,

मिश्री सी मुस्कान ठहरती,

पलकों पर घूंघरू बाजे.

स्वेटर के फंदों मे उलझी,

चश्मा उपर करती माँ,

फिर फिर किस्सा वही सुनाती ,

एक पोपली दादीमाँ,

आते जाते मटर उठाते,

गजक रेवड़ी खूब चबाते,

चिंगा पों की वो आवाजे,

धूप सनी गपशप बातें,

पास, पड़ोस, गली,मोहल्ले

सब की सब बाहर आ जाते ,

हँसी, ठिठोली, दुःख,सुख बाँटे,

धूप सेंकते घुलमिल जाते

 

वो फुरसत के पल आज फिर ढूंढती हूँ,

धूप की अँगुली पकड़े अपनों का पता ढूंढती हूँ|

धूप वही है,

गर्माहट कहीं खो गई है,

साझा आँगन सिमट गया कहीं,

दीवारें ऊँची हो गई हैं|

सबकुछ बाँट लिया है हमनें,

धूप को कैसे बाँटेंगे?

चाहे जो खरीद लें अब तो

वो भोली फुरसत कहाँ पाएंगे| 

 

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