हर शहर का अपना मौसम होता है| गुलाबी नगरी की इस गुलाबी ठंड में गुलदाऊदी और गेंदे की महक है| गजक की मीठास है शादियों की धूमधाम है रात को कड़ाही में उबल उबलकर गुलाबी होते दूध का लाजवाब स्वाद|मौसम का मजा लेना हो तो इन सब का खूब मजा़ लेना चाहिये| घर के नीचे लान में टहलते हुए जब भी फू़लों से बात करती हूं लगता है, मौसम कोई कविता सुना रहा है| अपने भीतर का शोर यदि हम शांत कर सके तो मौसम का गीत भी हम सुन सकते हैं|
संबोधन में मेरी अनुभूतियाँ ही नहीं अपितु आपकी भी अभिव्यिक्त है| शब्द अवश्य मेरे हैं पर भावनाऍ आपकी भी सम्मिलित हैं | मेरा संबोधन है समाज से, अपने आप से, प्रकृति से और संबंधो से, साथ ही उस परम सत्ता से जो मुझे अभिव्यक्ति की सामर्थ प्रदान करती है| थोड़ा सा भी मेरा लेखन आपके दिल को कहीं छूता है तो मेरी सार्थकता फलीभूत हो सकेगी | क्या अच्छा लगा या क्या कमी खली दोनों ही प्रतिक्रियाओं का तहेदिल से स्वागत है |
Thursday, 6 December 2012
Friday, 16 November 2012
Saturday, 3 November 2012
सावन
सावन तुम जब भी मेरी खिड़की पर दस्तक देते हो,
अलसाए से मन को उर्जा से भर देते हो |
बूंदों की छड़ी से जादू सा चला देते हो,
कुदरत की हर कोंपल को रंगो से भर देते हो
बादलों का झोला लटकाए
कभी हौले कभी तेज बरसते हो |
धरती के दामन को सौगातों से भर देते हो |
मिट्टी की खुशबू ये पैरों की छपछप,
अलबेली सी बयार संग नाचते ये विटप
पेड़ों के झूले ये हाथों की मेंहदी
लहेरियों के आँचल में, तीजों
की मस्ती
भीगे से तन और भीगे से मन में,
विरहा की टीसें हौले से सिसकती |
बाबुल के आँगन में सखियों के गानें
सिगड़ी पर सिकते वो भुट्टों के दानें
सावन तुमने छेड़ दिया क्यूँ यादों का साज़
बावरे से मन को कौन संभाले आज |
सावन तुम जब भी मेरी खिड़की पर दस्तक देते हो
इंद्रधनुषी पंखों
पर बैठा कहीं दूर ले चलते हो
सावन तुम जब भी मेरी खिड़की पर दस्तक देते हो |
दिवाली अभिनंदन
शरद का व्योम आज निर्मल है
पात पात में बिखरा रोली अक्षत है
मन के द्वार पर ,
अनजानी खुशी की दस्तक है ,
दीपो के उजास का
करता जग स्वागत है |
जड़ चेतन में फैला उल्लास है,
दीप की आशा सा
मन में विश्वास है ,
आस्था को सम्बल देता,
माँ लक्ष्मी के आने की आस है |
खुशियो की झालरों से सजा
घर, आँगन ,द्वार है ,
अल्पना में सजा ,
गृहिणी का प्यार है
मिल लें, खिल लें, फैला लें बाहें,
प्यार का दीप एक ह्रदय में जला लें |
नूतन उर्जा का अनुपम एहसास है,
अभिनंदन में तैयार हम,
कि दीपोत्सव पास है |
Thursday, 12 April 2012
आमंत्रण
ओ
सागर,
बारबार तुम्हारे आमंत्रण परउत्तर से दक्षिण चली आती हूँ मैं
सोचकर कि तुम्हारे इस हरित जल में
विलीन कर दूँ अपना अस्तित्व
हर पल तुम्हारी लहरों में,
बहता उत्ताल संगीत
मुखरित करता मुझे कि
शब्द सौंपकर गीत बना दूँ इस संगीत से
तट
पर होती तु्म्हारी यह व्यग्रता
प्रश्न पूछती मुझसे कि ह्रदय में भी क्या तुम एसे ही हो ?
क्षितिज को छूती
तुम्हारी यह विस्तृत जलराशितुम्हारी गहनता का प्रतिबिम्ब
उकेर देती है मेरे मानस में
बालरवि के आने से पहले
तुम्हारे तट की रेत पर,पदचिन्ह बनाते हुए चलना
और तुम्हारा आकर मेरे
पैरों का सहलाना बारबार
कि जैसे सहलाता है पिता
पितृगृह आई अपनी बेटी के माथे को
आज
घर लौटते हुए
कि
पीहर से मानो ले रही हूँ विदामेरी आँखे समा लेना चाहती हैं
तुम्हारे हर मंज़र को
तुम्हारे सारे संवादों को
सोचती हूँ
कि
अब न जाने कबफिर तुम मुझे आवाज़ दोगे
और मैं चली आऊँगी तुम्हारे पास
एक नया गीत गुनगुनाने |
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