Thursday, 6 December 2012

हर शहर का अपना मौसम होता है| गुलाबी नगरी की इस गुलाबी ठंड में गुलदाऊदी और गेंदे की महक है| गजक की मीठास है शादियों की धूमधाम है रात को कड़ाही में उबल उबलकर गुलाबी होते दूध का लाजवाब स्वाद|मौसम का मजा लेना हो तो इन सब का खूब मजा़ लेना चाहिये| घर के नीचे लान में टहलते हुए जब भी फू़लों से बात करती हूं लगता है, मौसम कोई कविता सुना रहा है| अपने भीतर का शोर यदि हम शांत कर सके तो मौसम का गीत भी हम सुन सकते हैं|

Friday, 16 November 2012

आज बहुत दिन बाद दोपहर में इतनी मीठी नींद आई| त्यौहारों का आना जितना उत्साहवर्धक होता है,जाना थोड़ा सा अवसादमय| रंग, रोशनी,मीठास से भरा दीवाली का त्यौहार| बची हुई मिठाईयों के टुकड़े,बिखरे हुऐ रंगोली के रंग मानों कह रही है कि हर दिन ही त्यौहार क्यों नहीं होता?

Saturday, 3 November 2012

सावन

सावन तुम जब भी मेरी खिड़की पर दस्तक देते हो,
अलसाए से मन को उर्जा से भर देते हो |
बूंदों की छड़ी से जादू सा चला देते हो,
कुदरत की हर कोंपल को रंगो से भर देते हो
 
बादलों का झोला लटकाए
कभी हौले कभी तेज बरसते हो |
धरती के दामन को सौगातों से भर देते हो |
 
मिट्टी की खुशबू ये पैरों की छपछप,
अलबेली सी बयार संग नाचते ये विटप
पेड़ों के झूले ये हाथों की मेंहदी
लहेरियों के आँचल में, तीजों की मस्ती
भीगे से तन और भीगे से मन में,
विरहा की टीसें हौले से सिसकती |
 
 बाबुल के आँगन में सखियों के गानें
सिगड़ी पर सिकते वो भुट्टों के दानें
सावन तुमने छेड़ दिया क्यूँ यादों का साज़
बावरे से मन को कौन संभाले आज |
 
सावन तुम जब भी मेरी खिड़की पर दस्तक देते हो
इंद्रधनुषी  पंखों पर बैठा कहीं दूर ले चलते हो
सावन तुम जब भी मेरी खिड़की पर दस्तक देते हो |

दिवाली अभिनंदन


शरद का व्योम आज निर्मल है

पा‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍त पात में बिखरा रोली अक्षत है 

मन के द्वार पर ,    

अनजानी खुशी की दस्तक है ,

दीपो के उजास का

करता जग स्वागत है |

जड़ चेतन में फैला उल्लास है,

दीप की आशा सा

मन में विश्वास है ,

आस्था को सम्बल देता,

माँ लक्ष्मी के आने की आस है |

खुशियो की झालरों से सजा

घर, आँगन ,द्वार है ,

अल्पना में सजा ,

गृहिणी का प्यार है

मिल लें, खिल लें, फैला लें बाहें,

प्यार का दीप एक ह्रदय में जला लें |

नूतन उर्जा का अनुपम एहसास है,

अभिनंदन में तैयार हम,

कि दीपोत्सव पास है |        

Thursday, 12 April 2012

आमंत्रण

 
ओ  सागर,
बारबार  तुम्हारे  आमंत्रण  पर
उत्तर  से  दक्षिण  चली  आती  हूँ  मैं
सोचकर  कि  तुम्हारे  इस  हरित  जल  में
विलीन  कर  दूँ  अपना अस्तित्व

हर पल तुम्हारी लहरों में,
बहता उत्ताल  संगीत
मुखरित करता मुझे कि
शब्द सौंपकर गीत बना दूँ इस संगीत से

तट पर होती तु्म्हारी यह व्यग्रता
प्रश्न पूछती मुझसे कि ह्रदय
में भी क्या तुम एसे ही हो ?

क्षितिज को छूती
तुम्हारी यह विस्तृत जलराशि
तुम्हारी गहनता का प्रतिबिम्ब
उकेर देती है मेरे मानस में

बालरवि के आने से पहले
तुम्हारे तट की रेत पर,
पदचिन्ह बनाते हुए चलना
और तुम्हारा आकर मेरे
पैरों का सहलाना बारबार
कि जैसे सहलाता है पिता
पितृगृह आई अपनी बेटी के माथे को

आज घर लौटते हुए
कि पीहर से मानो ले रही हूँ विदा
मेरी आँखे समा लेना चाहती हैं
तुम्हारे हर मंज़र को
तुम्हारे सारे संवादों को

सोचती हूँ
कि अब जाने कब
फिर तुम मुझे आवाज़ दोगे
और मैं चली आऊँगी तुम्हारे पास
एक नया गीत गुनगुनाने |